ठंडी हवा ने मुझसे पूछा,
बुझे अलाव पर फैले हाथ क्यों.
आँच का भुलावा है तू देता,
फैला कर बैठा है हाथ यों
यादों की राख क्यूंकर संजोता,
अब इनको भुला उड़ जाने दो.
हमने सर उठा फरमाया,
सहेजा है ज़रूर राखों को.
पर यादों की तहरीर ना समझना,
सोचना तो ये है की उड़ जाएँ तो
खबर फैलेगी आग की तरह
हो ना हो यहाँ अलाव जलता हो.
Friday, July 31, 2009
Saturday, July 11, 2009
ठरक
ख्वाहिशें थी कभी,
अब तो है ठरक रह गयी.
हुआ होता जो कभी सामना
तो भी कहते की तलब रह गयी.
रुख़ भी साधा था कभी,
बेरूख़ी वो तक़दीर साथ रह गयी
थे इरादे ठोस-ओ-बुलंद अपने
दलदल में धँसी बुनियाद साथ रह गयी.
कह तो देते हम कभी
किस्सा जो वो रात कह गयी.
पर खरोंची हैं दीवारें
टूटे नाख़ून हाथ टूटी दवात रह गयी.
अब तो है ठरक रह गयी.
हुआ होता जो कभी सामना
तो भी कहते की तलब रह गयी.
रुख़ भी साधा था कभी,
बेरूख़ी वो तक़दीर साथ रह गयी
थे इरादे ठोस-ओ-बुलंद अपने
दलदल में धँसी बुनियाद साथ रह गयी.
कह तो देते हम कभी
किस्सा जो वो रात कह गयी.
पर खरोंची हैं दीवारें
टूटे नाख़ून हाथ टूटी दवात रह गयी.
Subscribe to:
Posts (Atom)