Saturday, January 31, 2009

दिल ही दिल गुफ्तगू

छज्जे पे आ अटकी चाँदनी से,
कुछ दिल्लगी में यूँ ही.
हो मुखातिब कहा हमने अंदाज़ से,
कहाँ फ़िरोगी, रात ठहर जाती यहीं.

ये ठिठोली देख कुछ छेड़खानी से,
मस्त बयार ने भी दम भरा यूँ ही.
औ पकड़ इक बादल के टुकड़े को कोने से,
रात की ऐनक ज़रा कुछ साफ की.

ये हुआ ज़ाहिर कुछ उसकी निखरी रंगत से,
चाँदनी भी थोड़ा सा शर्मा गयी.
तंग हूँ इस रोज़ की इस जुदाई से,
आना ही है तो जाने की क्या बात हुई.

रोज़-रोज़ की इस आवाजाही से,
दिल की बातें तो ना साफ हुईं.
ये तो ज़ाहिर है मगर इस बात से,
कुछ न कुछ तो हममें बात हुई.

तड़पता बहुत तेरी चुप्पी की तिजारत से,
बात तेरे दिल की ना बेबाक हुई.
पर तोड़ ना देना दिल मेरा तुम अपनी बात से,
ग़लतफहमी से भला ख़ुशफ़हमी ही जो साथ हुई..

कुछ ना बोली चाँदनी पर इशारे से,
फिर मिलूंगी की चमक ले रवाँ हुई.
भरम ना टूटा आज इस उच्चवास से,फिर
रात की ऐनक पे थोड़ी ही सही, नम भाप हुई.

Thursday, January 29, 2009

karz

वो जो उड़ते फिरते हैं,
वो जो उड़ते फिरते हैं
हवा के झोंकों में फँसके
वे अपने ही हैं कुछ
पुराने पुर्ज़े रसीड़ों के .

फड़फड़ आ उठते भले हैं,
जब होते तलब हैं लेनदारों के.
घूम उँचे उड़ हैं जाते
पुराने पुर्ज़े रसीड़ों के.

झंझावात ई दौर थम से जाते हैं
नर्म तेवर पड़ते हैं कुछ लेनदारों के.
वापस धीरे टायर आते
पुराने पुर्ज़े रसीड़ों के.

वापस आ के कहते हमसे
एक बार फिरथे आसार जुदाई के
साँस चैन की खींच हमसे लिपट जाते
पुराने पुर्ज़े रसीड़ों के

कुछ ख़याल कर के हमारी
तन्हा हालत-ए-तंगहाली के,
स्वांग रच-रच लौट आते,
वे अपने पुराने पुर्ज़े नसीबों से.