ठंडी हवा ने मुझसे पूछा,
बुझे अलाव पर फैले हाथ क्यों.
आँच का भुलावा है तू देता,
फैला कर बैठा है हाथ यों
यादों की राख क्यूंकर संजोता,
अब इनको भुला उड़ जाने दो.
हमने सर उठा फरमाया,
सहेजा है ज़रूर राखों को.
पर यादों की तहरीर ना समझना,
सोचना तो ये है की उड़ जाएँ तो
खबर फैलेगी आग की तरह
हो ना हो यहाँ अलाव जलता हो.
Friday, July 31, 2009
Saturday, July 11, 2009
ठरक
ख्वाहिशें थी कभी,
अब तो है ठरक रह गयी.
हुआ होता जो कभी सामना
तो भी कहते की तलब रह गयी.
रुख़ भी साधा था कभी,
बेरूख़ी वो तक़दीर साथ रह गयी
थे इरादे ठोस-ओ-बुलंद अपने
दलदल में धँसी बुनियाद साथ रह गयी.
कह तो देते हम कभी
किस्सा जो वो रात कह गयी.
पर खरोंची हैं दीवारें
टूटे नाख़ून हाथ टूटी दवात रह गयी.
अब तो है ठरक रह गयी.
हुआ होता जो कभी सामना
तो भी कहते की तलब रह गयी.
रुख़ भी साधा था कभी,
बेरूख़ी वो तक़दीर साथ रह गयी
थे इरादे ठोस-ओ-बुलंद अपने
दलदल में धँसी बुनियाद साथ रह गयी.
कह तो देते हम कभी
किस्सा जो वो रात कह गयी.
पर खरोंची हैं दीवारें
टूटे नाख़ून हाथ टूटी दवात रह गयी.
Saturday, May 9, 2009
दिनचर्या
कभी तो शाम होगी
ये सोच धूप में आ गये
पर सूरज के इरादे और थे
झुलसे हुए ख़यालात ये
अपने ही हैं
इतना तो तय था
बनता था,हर हालत में.
रात ढले संग चाँदनी खेलेंगे
अधजगे अधसोए चकोर ये
अपने ही हैं
कुछ और ना सही, ना सही
सुबह कभी तो आएगी
अरुणिमा संग हम भी चहकेंगे
धुत अंधेरे के ख्वाब ये
अपने ही हैं
गुनगुनी होगी शायद
धूप खिली है जो बाहर में
सिहरन दूर होगी कम्स्कम
झुलसे हुए ख़यालात ये
अपने ही हैं
ये सोच धूप में आ गये
पर सूरज के इरादे और थे
झुलसे हुए ख़यालात ये
अपने ही हैं
इतना तो तय था
बनता था,हर हालत में.
रात ढले संग चाँदनी खेलेंगे
अधजगे अधसोए चकोर ये
अपने ही हैं
कुछ और ना सही, ना सही
सुबह कभी तो आएगी
अरुणिमा संग हम भी चहकेंगे
धुत अंधेरे के ख्वाब ये
अपने ही हैं
गुनगुनी होगी शायद
धूप खिली है जो बाहर में
सिहरन दूर होगी कम्स्कम
झुलसे हुए ख़यालात ये
अपने ही हैं
Wednesday, April 29, 2009
नाकाम कोशिशें
जोड़ तोड़ किस्सा तो खूब गढ़ा था,
बस कम्बख़्त बयानी मात दे गयी.
दिल तो हमारा देवदास सा गमगीन था,
बेतरतीब मौसम की रवानी मात दे गयी .
डुबा देता सबको उसमें ऐसा दर्द था,
बेमौका इक चुहल अंजानी मात दे गयी.
संग सबके ठठा के हँस लेता था,पर आह
सच थी पूरी, वो कहानी मात दे गयी.
और क्या कहें, शह पे थी उनकी बिसात,
बस एक घर से अपनी रानी मात दे गयी.
बस कम्बख़्त बयानी मात दे गयी.
दिल तो हमारा देवदास सा गमगीन था,
बेतरतीब मौसम की रवानी मात दे गयी .
डुबा देता सबको उसमें ऐसा दर्द था,
बेमौका इक चुहल अंजानी मात दे गयी.
संग सबके ठठा के हँस लेता था,पर आह
सच थी पूरी, वो कहानी मात दे गयी.
और क्या कहें, शह पे थी उनकी बिसात,
बस एक घर से अपनी रानी मात दे गयी.
Wednesday, April 15, 2009
आवारा रौनकें
ये तो बेहतर हुआ की ना पहचान पाए हमें वो,
हम होते शर्मसार, नज़रें उन्हें चुराना पड़त्ता जो.
बीती यादों के कुछ जाम छन जाते साथ उनके तो,
बेमुरव्वत बन जाते हम, बेतकल्लुफ भले हो जाते वो.
रौनक थे अपनी तमाम रंगीन महफ़िलों के वो,
क्या कहते जो हम पूछ लेते गैर महफ़िल में क्यों.
औ ज़ाया हो जाता दम वो भरा था हमने जो,
रौनक ऐसी बखुदा ना किसी और महफ़िल में हो.
हम होते शर्मसार, नज़रें उन्हें चुराना पड़त्ता जो.
बीती यादों के कुछ जाम छन जाते साथ उनके तो,
बेमुरव्वत बन जाते हम, बेतकल्लुफ भले हो जाते वो.
रौनक थे अपनी तमाम रंगीन महफ़िलों के वो,
क्या कहते जो हम पूछ लेते गैर महफ़िल में क्यों.
औ ज़ाया हो जाता दम वो भरा था हमने जो,
रौनक ऐसी बखुदा ना किसी और महफ़िल में हो.
Friday, April 10, 2009
दुन्दुभि
जो है सुगबुगाती, दम तोड़ती सी
दबी गुमनाम राख की परतों तले,
कुछ साँस में आग भर फूँक ऐसी मार के
चिंगार वो इक बार ज्वाला बन के जो जले .
जो सिसकती सी सारी रात खुद जले,
बन परवाना तू उस शमा को ऐसी ताब दे.
भभक उठे वो बन लपट विकराल प्रलय काल
संग अपने सारा का सारा लाक्षागृह वो ले जले.
फीके से खारे ये जलते आँसू तेरे
ना समझना तू की ये बेकार ही जले
भर के अंजुरी मार सागर में इन्हे, फिर देख
अश्रु बिंदु ये बड़वानल बन के जो जले.
डर ना जाना मेघों से खुराफाती इंद्र के
साथ मधुसूदन, बुलंद रख तेरे तू हौसले.
चाप चढ़ा गांडीव तू आकाश ये टंकार दे,
फिर बता समूचा खांडव वन जो ना जले.
दबी गुमनाम राख की परतों तले,
कुछ साँस में आग भर फूँक ऐसी मार के
चिंगार वो इक बार ज्वाला बन के जो जले .
जो सिसकती सी सारी रात खुद जले,
बन परवाना तू उस शमा को ऐसी ताब दे.
भभक उठे वो बन लपट विकराल प्रलय काल
संग अपने सारा का सारा लाक्षागृह वो ले जले.
फीके से खारे ये जलते आँसू तेरे
ना समझना तू की ये बेकार ही जले
भर के अंजुरी मार सागर में इन्हे, फिर देख
अश्रु बिंदु ये बड़वानल बन के जो जले.
डर ना जाना मेघों से खुराफाती इंद्र के
साथ मधुसूदन, बुलंद रख तेरे तू हौसले.
चाप चढ़ा गांडीव तू आकाश ये टंकार दे,
फिर बता समूचा खांडव वन जो ना जले.
Thursday, March 26, 2009
लौकी बूड़े सिल उतराए
आ गई जो धंधे में मंदी
बदल पोर्टफोलियो दस्यूराज वाल्मीकि हो गये.
शौकिया इश्क़ की जब बोतल मिली,
धर दबोच मौका दरुहल सभी देवदास हो गये.
सुध ना रही थी आई ऐसी फटे हाली,
गाहे बेगाहे यूँ ही लैला लैला चिल्ला दिए.
औ भइया जिन्हे ना पूछे था कोई,
सो यार अब लव गुरु, मजनू मियाँ हैं हो गये.
जूता चटकाए,खाक छाने हर गली,
छोड़ घर बंबई जो सारे थे भग गये.
गाँव लौट के उन्होने कुछ यूँ बघारी जो शेखी,
बस ये लगा के सब के सब हातिम ताई हो गये.
ज़हमत ना रही के लगा लें पैबंद भी,
आलस में उनके कुछ ऐसे भी दिन आ गये.
हो बिंदास जब फटी वो जीन्स है पहनी,
सब के सब जो काहिल थे, अब हाई फ़ाई हो गये.
और सुनाएँ क्या तुम्हें अब इस जमाने की,
अपने तो सभी हथकंडे पुराने हो गये.
हम भरा करते थे दम की हम एक्स हैं,
कल के लौनडे सभी अब जेनेरेशन वाई हो गये.
अपनी तो हालत क्या कहें की,
है लगा लगने घोड़े से गधे हैं हो गये.
बिठा संयुक्ता को दीवाल तो थी हमने फांदी,
सब कम्बख़त कहने लगे की दिलवाले पृथ्वीराज हो गये.
रावण बोला क्यूँ गिध सी नज़र है लगाई,
खड़े बचाने सीता को जटायु सक्के बक्के हो गये.
ऐसी हाय लगी दुनिया के सारे रावण जात की,
एक जटायु क्या सारे गिध धराशायी हो गये.
बदल पोर्टफोलियो दस्यूराज वाल्मीकि हो गये.
शौकिया इश्क़ की जब बोतल मिली,
धर दबोच मौका दरुहल सभी देवदास हो गये.
सुध ना रही थी आई ऐसी फटे हाली,
गाहे बेगाहे यूँ ही लैला लैला चिल्ला दिए.
औ भइया जिन्हे ना पूछे था कोई,
सो यार अब लव गुरु, मजनू मियाँ हैं हो गये.
जूता चटकाए,खाक छाने हर गली,
छोड़ घर बंबई जो सारे थे भग गये.
गाँव लौट के उन्होने कुछ यूँ बघारी जो शेखी,
बस ये लगा के सब के सब हातिम ताई हो गये.
ज़हमत ना रही के लगा लें पैबंद भी,
आलस में उनके कुछ ऐसे भी दिन आ गये.
हो बिंदास जब फटी वो जीन्स है पहनी,
सब के सब जो काहिल थे, अब हाई फ़ाई हो गये.
और सुनाएँ क्या तुम्हें अब इस जमाने की,
अपने तो सभी हथकंडे पुराने हो गये.
हम भरा करते थे दम की हम एक्स हैं,
कल के लौनडे सभी अब जेनेरेशन वाई हो गये.
अपनी तो हालत क्या कहें की,
है लगा लगने घोड़े से गधे हैं हो गये.
बिठा संयुक्ता को दीवाल तो थी हमने फांदी,
सब कम्बख़त कहने लगे की दिलवाले पृथ्वीराज हो गये.
रावण बोला क्यूँ गिध सी नज़र है लगाई,
खड़े बचाने सीता को जटायु सक्के बक्के हो गये.
ऐसी हाय लगी दुनिया के सारे रावण जात की,
एक जटायु क्या सारे गिध धराशायी हो गये.
Monday, March 16, 2009
बेरूख़ी
यूँ ही जो गर हुए जज़्बाती
तो कहने लगे की जज़्बाती हो जाते हो.
दरकिनार कर दें जो दिल को
तो पत्थर होने का इल्ज़ाम लगाते हो.
मतलब तो हो कहीं कह के कस दी फबती,
मुदा तुम भी यार बातें अजब बनाते हो.
बात बदली जो कहीं मतलब की ओर हमने
फर्मा दिए क्या मतलबी बातें बनाते हो.
कुछ था नही तो हमने भर ली जो चुप्पी,
इससे भले तो जब कभी तुम बड़बड़ाते हो.
और क्या कहें यूँ ही हैं दूरियाँ बहुत,
खामोशी से भला फ़ासले तुम क्यूँ बढ़ाते हो.
तो कहने लगे की जज़्बाती हो जाते हो.
दरकिनार कर दें जो दिल को
तो पत्थर होने का इल्ज़ाम लगाते हो.
मतलब तो हो कहीं कह के कस दी फबती,
मुदा तुम भी यार बातें अजब बनाते हो.
बात बदली जो कहीं मतलब की ओर हमने
फर्मा दिए क्या मतलबी बातें बनाते हो.
कुछ था नही तो हमने भर ली जो चुप्पी,
इससे भले तो जब कभी तुम बड़बड़ाते हो.
और क्या कहें यूँ ही हैं दूरियाँ बहुत,
खामोशी से भला फ़ासले तुम क्यूँ बढ़ाते हो.
Friday, March 13, 2009
उम्मीद
जहाँ कभी सजती थी, रौनक भारी फ़िज़ा,
मुर्दानगी की महफ़िलों ने भी भरा दम.
जाम ले के बाँटती थी मद भारी कज़ा,
फिर घूँट खून पी, राख फूँक आए हम.
सुनते थे जलवे, वहाँ ऐसा हुआ, वैसा हुआ,
थे लिए अरमान देखने जलता तूर आए हम.
शिकवा है सरपरस्त उस बदहवासी में जो हुआ,
बात मेरी मान, थे इरादे ले के नेक आए हम.
बाद मुद्दत लौटा आज था वीराना पड़ा हुआ,
बस वही उजाड़ तनहाईयाँ थीं कदम कदम.
सहमा सकुंचा सोच के की पाऊँ ना लूटा हुआ,
जोश ओ शिद्दत थे कभी जो देख आए हम.
बंद खिड़की, थे जड़े किवाड़, ताला था पड़ा हुआ,
सेंध ना थी कोई लगी कहीं, देख फ़िक्र हुई कम.
लौट आए कल शायद, बस्त्ता था यहीं अपना खुदा,
आज बंद दरवाज़ों पे ही मत्था टेक आए हम.
मुर्दानगी की महफ़िलों ने भी भरा दम.
जाम ले के बाँटती थी मद भारी कज़ा,
फिर घूँट खून पी, राख फूँक आए हम.
सुनते थे जलवे, वहाँ ऐसा हुआ, वैसा हुआ,
थे लिए अरमान देखने जलता तूर आए हम.
शिकवा है सरपरस्त उस बदहवासी में जो हुआ,
बात मेरी मान, थे इरादे ले के नेक आए हम.
बाद मुद्दत लौटा आज था वीराना पड़ा हुआ,
बस वही उजाड़ तनहाईयाँ थीं कदम कदम.
सहमा सकुंचा सोच के की पाऊँ ना लूटा हुआ,
जोश ओ शिद्दत थे कभी जो देख आए हम.
बंद खिड़की, थे जड़े किवाड़, ताला था पड़ा हुआ,
सेंध ना थी कोई लगी कहीं, देख फ़िक्र हुई कम.
लौट आए कल शायद, बस्त्ता था यहीं अपना खुदा,
आज बंद दरवाज़ों पे ही मत्था टेक आए हम.
Saturday, January 31, 2009
दिल ही दिल गुफ्तगू
छज्जे पे आ अटकी चाँदनी से,
कुछ दिल्लगी में यूँ ही.
हो मुखातिब कहा हमने अंदाज़ से,
कहाँ फ़िरोगी, रात ठहर जाती यहीं.
ये ठिठोली देख कुछ छेड़खानी से,
मस्त बयार ने भी दम भरा यूँ ही.
औ पकड़ इक बादल के टुकड़े को कोने से,
रात की ऐनक ज़रा कुछ साफ की.
ये हुआ ज़ाहिर कुछ उसकी निखरी रंगत से,
चाँदनी भी थोड़ा सा शर्मा गयी.
तंग हूँ इस रोज़ की इस जुदाई से,
आना ही है तो जाने की क्या बात हुई.
रोज़-रोज़ की इस आवाजाही से,
दिल की बातें तो ना साफ हुईं.
ये तो ज़ाहिर है मगर इस बात से,
कुछ न कुछ तो हममें बात हुई.
तड़पता बहुत तेरी चुप्पी की तिजारत से,
बात तेरे दिल की ना बेबाक हुई.
पर तोड़ ना देना दिल मेरा तुम अपनी बात से,
ग़लतफहमी से भला ख़ुशफ़हमी ही जो साथ हुई..
कुछ ना बोली चाँदनी पर इशारे से,
फिर मिलूंगी की चमक ले रवाँ हुई.
भरम ना टूटा आज इस उच्चवास से,फिर
रात की ऐनक पे थोड़ी ही सही, नम भाप हुई.
कुछ दिल्लगी में यूँ ही.
हो मुखातिब कहा हमने अंदाज़ से,
कहाँ फ़िरोगी, रात ठहर जाती यहीं.
ये ठिठोली देख कुछ छेड़खानी से,
मस्त बयार ने भी दम भरा यूँ ही.
औ पकड़ इक बादल के टुकड़े को कोने से,
रात की ऐनक ज़रा कुछ साफ की.
ये हुआ ज़ाहिर कुछ उसकी निखरी रंगत से,
चाँदनी भी थोड़ा सा शर्मा गयी.
तंग हूँ इस रोज़ की इस जुदाई से,
आना ही है तो जाने की क्या बात हुई.
रोज़-रोज़ की इस आवाजाही से,
दिल की बातें तो ना साफ हुईं.
ये तो ज़ाहिर है मगर इस बात से,
कुछ न कुछ तो हममें बात हुई.
तड़पता बहुत तेरी चुप्पी की तिजारत से,
बात तेरे दिल की ना बेबाक हुई.
पर तोड़ ना देना दिल मेरा तुम अपनी बात से,
ग़लतफहमी से भला ख़ुशफ़हमी ही जो साथ हुई..
कुछ ना बोली चाँदनी पर इशारे से,
फिर मिलूंगी की चमक ले रवाँ हुई.
भरम ना टूटा आज इस उच्चवास से,फिर
रात की ऐनक पे थोड़ी ही सही, नम भाप हुई.
Thursday, January 29, 2009
karz
वो जो उड़ते फिरते हैं,
वो जो उड़ते फिरते हैं
हवा के झोंकों में फँसके
वे अपने ही हैं कुछ
पुराने पुर्ज़े रसीड़ों के .
फड़फड़ आ उठते भले हैं,
जब होते तलब हैं लेनदारों के.
घूम उँचे उड़ हैं जाते
पुराने पुर्ज़े रसीड़ों के.
झंझावात ई दौर थम से जाते हैं
नर्म तेवर पड़ते हैं कुछ लेनदारों के.
वापस धीरे टायर आते
पुराने पुर्ज़े रसीड़ों के.
वापस आ के कहते हमसे
एक बार फिरथे आसार जुदाई के
साँस चैन की खींच हमसे लिपट जाते
पुराने पुर्ज़े रसीड़ों के
कुछ ख़याल कर के हमारी
तन्हा हालत-ए-तंगहाली के,
स्वांग रच-रच लौट आते,
वे अपने पुराने पुर्ज़े नसीबों से.
वो जो उड़ते फिरते हैं
हवा के झोंकों में फँसके
वे अपने ही हैं कुछ
पुराने पुर्ज़े रसीड़ों के .
फड़फड़ आ उठते भले हैं,
जब होते तलब हैं लेनदारों के.
घूम उँचे उड़ हैं जाते
पुराने पुर्ज़े रसीड़ों के.
झंझावात ई दौर थम से जाते हैं
नर्म तेवर पड़ते हैं कुछ लेनदारों के.
वापस धीरे टायर आते
पुराने पुर्ज़े रसीड़ों के.
वापस आ के कहते हमसे
एक बार फिरथे आसार जुदाई के
साँस चैन की खींच हमसे लिपट जाते
पुराने पुर्ज़े रसीड़ों के
कुछ ख़याल कर के हमारी
तन्हा हालत-ए-तंगहाली के,
स्वांग रच-रच लौट आते,
वे अपने पुराने पुर्ज़े नसीबों से.
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