Friday, March 13, 2009

उम्मीद

जहाँ कभी सजती थी, रौनक भारी फ़िज़ा,
मुर्दानगी की महफ़िलों ने भी भरा दम.
जाम ले के बाँटती थी मद भारी कज़ा,
फिर घूँट खून पी, राख फूँक आए हम.

सुनते थे जलवे, वहाँ ऐसा हुआ, वैसा हुआ,
थे लिए अरमान देखने जलता तूर आए हम.
शिकवा है सरपरस्त उस बदहवासी में जो हुआ,
बात मेरी मान, थे इरादे ले के नेक आए हम.

बाद मुद्दत लौटा आज था वीराना पड़ा हुआ,
बस वही उजाड़ तनहाईयाँ थीं कदम कदम.
सहमा सकुंचा सोच के की पाऊँ ना लूटा हुआ,
जोश ओ शिद्दत थे कभी जो देख आए हम.

बंद खिड़की, थे जड़े किवाड़, ताला था पड़ा हुआ,
सेंध ना थी कोई लगी कहीं, देख फ़िक्र हुई कम.
लौट आए कल शायद, बस्त्ता था यहीं अपना खुदा,
आज बंद दरवाज़ों पे ही मत्था टेक आए हम.

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