Monday, March 16, 2009

बेरूख़ी

यूँ ही जो गर हुए जज़्बाती
तो कहने लगे की जज़्बाती हो जाते हो.
दरकिनार कर दें जो दिल को
तो पत्थर होने का इल्ज़ाम लगाते हो.

मतलब तो हो कहीं कह के कस दी फबती,
मुदा तुम भी यार बातें अजब बनाते हो.
बात बदली जो कहीं मतलब की ओर हमने
फर्मा दिए क्या मतलबी बातें बनाते हो.

कुछ था नही तो हमने भर ली जो चुप्पी,
इससे भले तो जब कभी तुम बड़बड़ाते हो.
और क्या कहें यूँ ही हैं दूरियाँ बहुत,
खामोशी से भला फ़ासले तुम क्यूँ बढ़ाते हो.

1 comment:

Rahul Rai said...

bhai mana kiya tha jazbaati hone se...phir kyun...matlab bhai dekh....daru kam pi...ganja mat pi...tab saaf saaf dikhai dega...nahi to is dhuen ke beech baithkar sab kuch dhundla hi nazar aata hai