Thursday, March 26, 2009

लौकी बूड़े सिल उतराए

आ गई जो धंधे में मंदी
बदल पोर्टफोलियो दस्यूराज वाल्मीकि हो गये.
शौकिया इश्क़ की जब बोतल मिली,
धर दबोच मौका दरुहल सभी देवदास हो गये.

सुध ना रही थी आई ऐसी फटे हाली,
गाहे बेगाहे यूँ ही लैला लैला चिल्ला दिए.
औ भइया जिन्हे ना पूछे था कोई,
सो यार अब लव गुरु, मजनू मियाँ हैं हो गये.

जूता चटकाए,खाक छाने हर गली,
छोड़ घर बंबई जो सारे थे भग गये.
गाँव लौट के उन्होने कुछ यूँ बघारी जो शेखी,
बस ये लगा के सब के सब हातिम ताई हो गये.

ज़हमत ना रही के लगा लें पैबंद भी,
आलस में उनके कुछ ऐसे भी दिन आ गये.
हो बिंदास जब फटी वो जीन्स है पहनी,
सब के सब जो काहिल थे, अब हाई फ़ाई हो गये.

और सुनाएँ क्या तुम्हें अब इस जमाने की,
अपने तो सभी हथकंडे पुराने हो गये.
हम भरा करते थे दम की हम एक्स हैं,
कल के लौनडे सभी अब जेनेरेशन वाई हो गये.

अपनी तो हालत क्या कहें की,
है लगा लगने घोड़े से गधे हैं हो गये.
बिठा संयुक्ता को दीवाल तो थी हमने फांदी,
सब कम्बख़त कहने लगे की दिलवाले पृथ्वीराज हो गये.

रावण बोला क्यूँ गिध सी नज़र है लगाई,
खड़े बचाने सीता को जटायु सक्के बक्के हो गये.
ऐसी हाय लगी दुनिया के सारे रावण जात की,
एक जटायु क्या सारे गिध धराशायी हो गये.

Monday, March 16, 2009

बेरूख़ी

यूँ ही जो गर हुए जज़्बाती
तो कहने लगे की जज़्बाती हो जाते हो.
दरकिनार कर दें जो दिल को
तो पत्थर होने का इल्ज़ाम लगाते हो.

मतलब तो हो कहीं कह के कस दी फबती,
मुदा तुम भी यार बातें अजब बनाते हो.
बात बदली जो कहीं मतलब की ओर हमने
फर्मा दिए क्या मतलबी बातें बनाते हो.

कुछ था नही तो हमने भर ली जो चुप्पी,
इससे भले तो जब कभी तुम बड़बड़ाते हो.
और क्या कहें यूँ ही हैं दूरियाँ बहुत,
खामोशी से भला फ़ासले तुम क्यूँ बढ़ाते हो.

Friday, March 13, 2009

उम्मीद

जहाँ कभी सजती थी, रौनक भारी फ़िज़ा,
मुर्दानगी की महफ़िलों ने भी भरा दम.
जाम ले के बाँटती थी मद भारी कज़ा,
फिर घूँट खून पी, राख फूँक आए हम.

सुनते थे जलवे, वहाँ ऐसा हुआ, वैसा हुआ,
थे लिए अरमान देखने जलता तूर आए हम.
शिकवा है सरपरस्त उस बदहवासी में जो हुआ,
बात मेरी मान, थे इरादे ले के नेक आए हम.

बाद मुद्दत लौटा आज था वीराना पड़ा हुआ,
बस वही उजाड़ तनहाईयाँ थीं कदम कदम.
सहमा सकुंचा सोच के की पाऊँ ना लूटा हुआ,
जोश ओ शिद्दत थे कभी जो देख आए हम.

बंद खिड़की, थे जड़े किवाड़, ताला था पड़ा हुआ,
सेंध ना थी कोई लगी कहीं, देख फ़िक्र हुई कम.
लौट आए कल शायद, बस्त्ता था यहीं अपना खुदा,
आज बंद दरवाज़ों पे ही मत्था टेक आए हम.