Sunday, December 7, 2008

ख्वाब जो नींद मैं रास्ता भटक गया

कल बिस्तर पे बदल के करवट , सोचा किसी से मिल आता ,
जो न आया बहुत दिनों से , उस ख्वाब का पता लगा आता.

सड़क की भीड़ भाड़ से बचता , मैं कुछ गलियों से था निकल रहा ,
पहचानी नज़रों से छुपता , छज्जों के सायों से था गुज़र रहा .

चलते चलते रात हो चली , नज़रों की अब परवाह न थी ,
पर जो सोच चला था इसपे , शायद यह वह राह न थी .

ख्वाब मेरा वहा रहता था , घर से थोडी सी ही दूरी पे ,
अब इसमे मेरा दोष न था , मैं नींद मैं रास्ता भटक गया .

फिर सोचा की हो सकता है , वोह मुझे ढूँढने निकला हो ,
वापस घर जाकर मैं देखूं , सिरहाने पर बैठा हो .

यही सोचकर आज भी मैं , वापस घर को लौट गया ,
अब खवाब को भी मैं दोष क्या दूँ , वोह नींद मैं रास्ता भटक गया.

नाह

चलते रहे इस शुबहे पर,
की रुके रहे गर हम
तो लोग पहचानने लगेंगे।

मुँह फेर बढ़ते रहे,
की अंजानी मुलाक़ातों का दम
भरने पे लोग जानने लगेंगे।

हाथ बढ़ाने से कतराये ,
कुछ यूँ सोच सोच हम
की बढ़े हाथ लोग थामने लगेंगे।

बढ़े हाथों से कतराये,
की हाथ थाम लें जो हम
लोग हाथ खींच बैठाने लगेंगे।

मंज़िलों का न्योता ठुकराए गये
की आशियाँ सजाएँ कहीं जो हम
तो लोग वहाँ बस्तियाँ बनाने लगेंगे।

मंज़िलें रूठीं, ज़माने मुकर गये,
रास्ते का साथ भी ठुकरा देते हम
पर "अब रास्ते पे गये हैं"
लोग कुछ ऐसी बातें बनाने लगेंगे.

- अंकुर शुक्ला "गुटखा" -

Starting of a new blog: "Gutkha's Ramblings"

Over the past many days, I have been telling my friend, Ankur Shukla (yes, that is the real name of "Gutkha") to record his writings somewhere and not throw them like a waste piece of paper but ofcourse as anyone who knows Gutkha will agree that he is too indifferent to do that. He has already lost many of his poems so I thought I will collect them and put them over on my blog. I am creating one separate blog for his writings named "Gutkha's Ramblings". To browse through his work, just click on this blog.