Sunday, December 7, 2008

नाह

चलते रहे इस शुबहे पर,
की रुके रहे गर हम
तो लोग पहचानने लगेंगे।

मुँह फेर बढ़ते रहे,
की अंजानी मुलाक़ातों का दम
भरने पे लोग जानने लगेंगे।

हाथ बढ़ाने से कतराये ,
कुछ यूँ सोच सोच हम
की बढ़े हाथ लोग थामने लगेंगे।

बढ़े हाथों से कतराये,
की हाथ थाम लें जो हम
लोग हाथ खींच बैठाने लगेंगे।

मंज़िलों का न्योता ठुकराए गये
की आशियाँ सजाएँ कहीं जो हम
तो लोग वहाँ बस्तियाँ बनाने लगेंगे।

मंज़िलें रूठीं, ज़माने मुकर गये,
रास्ते का साथ भी ठुकरा देते हम
पर "अब रास्ते पे गये हैं"
लोग कुछ ऐसी बातें बनाने लगेंगे.

- अंकुर शुक्ला "गुटखा" -

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