Wednesday, April 15, 2009

आवारा रौनकें

ये तो बेहतर हुआ की ना पहचान पाए हमें वो,
हम होते शर्मसार, नज़रें उन्हें चुराना पड़त्ता जो.

बीती यादों के कुछ जाम छन जाते साथ उनके तो,
बेमुरव्वत बन जाते हम, बेतकल्लुफ भले हो जाते वो.

रौनक थे अपनी तमाम रंगीन महफ़िलों के वो,
क्या कहते जो हम पूछ लेते गैर महफ़िल में क्यों.

औ ज़ाया हो जाता दम वो भरा था हमने जो,
रौनक ऐसी बखुदा ना किसी और महफ़िल में हो.

3 comments:

gutkha said...

it sucks. i know.

Himanshu Pandey said...

सुन्दर प्रविष्टि ।

Rider on the Storm said...

kaafi acchi likhi hai