जो है सुगबुगाती, दम तोड़ती सी
दबी गुमनाम राख की परतों तले,
कुछ साँस में आग भर फूँक ऐसी मार के
चिंगार वो इक बार ज्वाला बन के जो जले .
जो सिसकती सी सारी रात खुद जले,
बन परवाना तू उस शमा को ऐसी ताब दे.
भभक उठे वो बन लपट विकराल प्रलय काल
संग अपने सारा का सारा लाक्षागृह वो ले जले.
फीके से खारे ये जलते आँसू तेरे
ना समझना तू की ये बेकार ही जले
भर के अंजुरी मार सागर में इन्हे, फिर देख
अश्रु बिंदु ये बड़वानल बन के जो जले.
डर ना जाना मेघों से खुराफाती इंद्र के
साथ मधुसूदन, बुलंद रख तेरे तू हौसले.
चाप चढ़ा गांडीव तू आकाश ये टंकार दे,
फिर बता समूचा खांडव वन जो ना जले.
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