Thursday, January 29, 2009

karz

वो जो उड़ते फिरते हैं,
वो जो उड़ते फिरते हैं
हवा के झोंकों में फँसके
वे अपने ही हैं कुछ
पुराने पुर्ज़े रसीड़ों के .

फड़फड़ आ उठते भले हैं,
जब होते तलब हैं लेनदारों के.
घूम उँचे उड़ हैं जाते
पुराने पुर्ज़े रसीड़ों के.

झंझावात ई दौर थम से जाते हैं
नर्म तेवर पड़ते हैं कुछ लेनदारों के.
वापस धीरे टायर आते
पुराने पुर्ज़े रसीड़ों के.

वापस आ के कहते हमसे
एक बार फिरथे आसार जुदाई के
साँस चैन की खींच हमसे लिपट जाते
पुराने पुर्ज़े रसीड़ों के

कुछ ख़याल कर के हमारी
तन्हा हालत-ए-तंगहाली के,
स्वांग रच-रच लौट आते,
वे अपने पुराने पुर्ज़े नसीबों से.

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