कल बिस्तर पे बदल के करवट , सोचा किसी से मिल आता ,
जो न आया बहुत दिनों से , उस ख्वाब का पता लगा आता.
सड़क की भीड़ भाड़ से बचता , मैं कुछ गलियों से था निकल रहा ,
पहचानी नज़रों से छुपता , छज्जों के सायों से था गुज़र रहा .
चलते चलते रात हो चली , नज़रों की अब परवाह न थी ,
पर जो सोच चला था इसपे , शायद यह वह राह न थी .
ख्वाब मेरा वहा रहता था , घर से थोडी सी ही दूरी पे ,
अब इसमे मेरा दोष न था , मैं नींद मैं रास्ता भटक गया .
फिर सोचा की हो सकता है , वोह मुझे ढूँढने निकला हो ,
वापस घर जाकर मैं देखूं , सिरहाने पर बैठा हो .
यही सोचकर आज भी मैं , वापस घर को लौट गया ,
अब खवाब को भी मैं दोष क्या दूँ , वोह नींद मैं रास्ता भटक गया.
Sunday, December 7, 2008
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4 comments:
शुभकामनाएं !
अच्छी अभिव्यक्ति........लिखता रहें
one of the best poem i have ever read............. way to go gutkha
doston...mai bhi yahan contribute karna chahta hoon...hindi me kaise likh sakta hon kripaya batayen?
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